August 3, 2026
#Social Responsibility

तो फिर, लोकतंत्र की लुटिया डूबी कैसे? ‎

क्या हम एक ऐसे दौर में हैं, जब असली सवालों को गायब ‎कर दिया जाता है और नकली सवाल सजधज के साथ ‎लोगों के मन में भर दिया गया है। आज के प्रमुख ‎सवालों में एक यह है कि क्यों राजनीति सिर्फ सत्ता की ‎सीढ़ी बनती चली गई है। दुखद यह है कि इस सीढ़ी को ‎राजनीति नहीं संभालती है, बल्कि अब अपराध-तंत्र संभाल ‎रहा है।


भारतीय लोकतंत्र की इस बेआवाज भीतरी टूटन ‎को बचाने के लिए, जिनसे आगे आने की उम्मीद थी, वे दबाव में ‎दुम दबाकर बैठ रहे हैं। देश में जरूरी बहस यह चली कि ‎संसद बड़ी है या सुप्रीम कोर्ट! जवाब आया संविधान ‎बड़ा है। लेकिन असल जवाब छिपा लिया गया कि सभी ‎बड़ों से बड़ा यानी सब से बड़ा चुनाव आयोग है। देश के ‎साधारण लोग तो सदा मानते रहे हैं कि सभी बड़े हैं! ये ‎सभी बड़े मिलकर भी साधारण नागरिकों की तर्जनी की ‎अमिट स्याही के वजूद को नहीं बचा पाये! लोकतंत्र के ‎खुशनसीबों की बात और है। ‎


अभी-अभी चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, ‎तमिलनाडु, केरल और एक केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी में ‎चुनाव हुए। असम में कोई बदलाव नहीं हुआ। बदलाव ‎हुआ तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में। पश्चिम ‎बंगाल में तो ऐसा लगता है कि सरकार ही नहीं बदली ‎है, बल्कि “सब-कुछ” बदल गया है! संविधान वही, ‎कानून वही, कानून को लागू करनेवाले वही तो फिर ‎सब-कुछ कैसे बदल गया! संविधान, कोर्ट-कचहरी सभी ‎तो वैसे ही हैं! बदलाव बदला का पैगाम लेकर आ गया ‎‎— बदला यानी प्रतिशोध। अभी तो संविधान की शपथ ‎लेकर सरकार हाथ-मुंह भी ठीक से धो नहीं पाई है। न ‎कोई कानून बना या बदला है। अभी तो कायदे से कानून ‎बनानेवाली विधानसभा बैठी भी नहीं है! इतनी तोड़-‎फोड़, गैर-कानूनी कामों के इतने बड़े-बड़े खुलासे! क्या ‎अचरज में नहीं डालता है?‎


कानून को लागू करनेवाले लोगों को बताना चाहिए कि जब पुरानी सरकार के दौर में इतने बड़े-बड़े ‎गैर-कानूनी काम हो रहे थे तो वे क्या कर रहे थे? पुराने ‎समय के सत्ताधारी दल का दबाव था? दबाव झेल नहीं ‎पाये! तो अब क्या दबाव झेल पा रहे हैं! नहीं-नहीं ‎कानून को लागू करनेवाले न तब दबाव झेल पाये थे न ‎अब झेल पा रहे हैं। तो क्यों नहीं कानून को लागू ‎करनेवाले पर कर्तव्य पालन न करने का अभियोग लगे? ‎


कहने का तात्पर्य सीधा है कि सत्ताधारी दल के आगे घुटने ‎टेके रहनेवाले शाह बने नौकरशाह भी कोई कम ‎जिम्मेदार नहीं हैं। नौकरशाह भी सत्ताधारी दल में ‎चुपके से शामिल हो जाते हैं। दलीय राजनीति और ‎निर्दलीय नौकरशाही ने मिलकर ऐसा कीचड़ किया कि ‎लोकतंत्र का चक्का उसमें फंस गया है। ‎


भारत के संविधान के अनुसार, ईश्वर की शपथ या सत्यनिष्ठा से किये गये प्रतिज्ञा कि विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखने तथा भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करने के आश्वासन का क्या मतलब रह गया है?
‎नौकरशाहों पर भी ‎सत्यनिष्ठा की प्रतिज्ञा, आचरण के नियम की बाध्यता रहती ही है। तो फिर, लोकतंत्र की लुटिया डूबी कैसे? बहरहाल ये जनता के सोचने की बात है! बात है, षडयंत्र नहीं! वर्तमान दौर में संवाद और षडयंत्र का फर्क ही मिट गया है। मुफ्तखोरी से नहीं शपथखोरी से लोकतंत्र लहूलुहान हुआ है।

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